ग्रहों का व्यवसाय पर प्रभाव
व्यवसायों के प्रकार का निर्णय ग्रहों को स्वरूप, बल आदि पर निर्भर करता है । जो ग्रह अत्यधिक बलवान् होकर लग्न, लग्नेश आदि आजीविका के द्योतक अंगों पर प्रभाव डालता है वह ग्रह आजीविका के स्वरूप अथवा प्रकार (Nature) को जतलाने बाला होता है ।
अतः ग्रहों के स्वरूप का ज्ञान आजीविका के निर्णय करने के लिये अत्यावश्यक है । इसी तथ्य को दृष्टि में रखते हुए ग्रहों के स्वरूप का कुछ विवेचन नीचे किया जाता है ।
सूर्य
सूर्य सब ग्रहों में ऊँचा (श्रेष्ठ) बड़ा, मुख्य व राजा है। इस लिये जब यह ग्रह धन्धों को दर्शाता है तो वह व्यवसाय ऊँचे दरजे का, विस्तृत क्षेत्र में व्यापक, बहुत प्रदेशों से सम्बन्धित, बहुत पूँजी वाला होता है। सूर्य का राज्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है, क्योंकि सूर्य स्वयं राजा, राजपुरुष है ।
अतः जब सूर्य व्यवसाय का निर्णायक हो तो उस व्यवसाय का संम्बन्ध राज्य से किसी-न-किसी प्रकार का होता है। यदि सूर्य बहुत बलवान् हो तो राज्यशासन द्वारा धन दे देता है । मध्यम बली हो तो बड़ा राज्याधिकारी बना देता है और यदि साधारण रूप से बलवान् हो तो मनुष्य को साधारण राज्य कर्मचारी बना देता है ।
यदि सूर्य का लग्न, लग्नेश, राशीश आदि से अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक सम्बन्ध हो अर्थात अपनी युति अथवा दृष्टि द्वारा सूर्य इन लग्नादि पर प्रभाव डाल रहा हो तो सूर्य व्यवसाय की दिशा को जतलाता है।
यदि द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश, एकादशेश हो कर बलवान हो तो मनुष्य को दूसरों पर शासन करने वाला राजा, गवर्नर, मन्त्री, प्रेजिडेन्ट, नवाब आदि उच्च पदवी वाला शासक बना देता है ।
सूर्य अग्निरूप है । जब यह मंगल और केतु के साथ मिलकर कार्य करता है तो अग्नि-सम्बन्धित कार्य जैसे बिजली का कार्य, बिजली के सामान का कार्य, तोप बन्दूक का कार्य, रेडियो से संबन्धित कार्य करवाता है।
चूँकि सूर्य पिता है और नवम स्थान पिता का है तथा पंचम भाव का भी नवम से नवम होने के कारण पिता से सम्बन्ध है अतः यदि व्यवसाय-द्योतक ग्रह पर सूर्य, नवमेश तथा पंचमेश तथा इन भावों का सम्बन्ध हो तो मनुष्य पिता के साथ मिलकर कारोबार करता है । उसी पर निर्भर रहता है स्वतन्त्र कार्य नहीं करता ।
सूर्य को वैद्य भी माना गया है। जब अन्य वैद्य – द्योतक ग्रहों का प्रभाव तथा सूर्य का प्रभाव मिलकर व्यवसाय-द्योतक ग्रह पर पड़ता तो वे मनुष्य को डाक्टर अथवा वैद्य बना देते हैं । अन्य ‘वैद्यक’ द्योतक ग्रह हैं – शनि तथा राहु ।
सूर्य एक सात्विक ग्रह है जब यह गुरु, नवमेश आदि धार्मिक ग्रहों को साथ लेकर ‘व्यवसाय’- द्योतक ग्रहों पर प्रभाव करता है तो मनुष्य धर्म से धन कमाता है अर्थात् किसी मन्दिर के पुजारी के रूप में, किसी मठ के अधीश के रूप में, किसी संस्था के पुरोहित के रूप में उसको धन, वेतन, दान की प्राप्ति होती है ।
इस सन्दर्भ में द्वादश स्थान ‘धर्म मन्दिर’ का द्योतक है। क्योंकि द्वादश स्थान नवम से चतुर्थ है अर्थात धर्म (नवम) अथवा ‘देव’ का घर अथवा स्थान (चतुर्थ) है।
सूर्य लकड़ी (wood) का कारक भी है। जब सूर्य चतुर्थेश होकर अथवा चतुर्थेश से सम्बन्ध रखता हुआ व्यवसाय का द्योतक हो तो लकड़ी से सम्बन्धित कार्य को देता है जैसे इमारती लकड़ी बेचने वाला (Timber Merchant) अथवा फरनीचर बेचने वाला (Furniture Dealer) बनाता है, क्योंकि चतुर्थेश, घर के निर्माता तथा घर की सुविधाओं (Furnishing) आदि से धनिष्ठ संबन्ध रखता है ।
चन्द्र
ग्रहों में चन्द्र ‘जलीय’ है। शुक्र भी जलीय ग्रह है। चतुर्थेश, अष्टमेश तथा द्वादशेश भी ‘जलीय’ प्रभाव रखते हैं। अतः यदि चन्द्र का दूसरे ‘जलीय’ अंगों का ‘व्यवसाय द्योतक’ ग्रह पर प्रभाव हो तो मनुष्य ‘जलीय’ कार्यों द्वारा धनोपार्जन करता है। जैसे जलसेना में कार्य करना, सोडा वाटर फैक्टरी (Soda water factory ) में कार्य करना, रंग निर्माण (paints manufacture) आदि कार्य करना, शर्बत बेचना, नाव चलाना, पानी के वितरण विभाग (Water Supply Department) में काम करना आदि ।
चन्द्र का खाने-पीने से घनिष्ठ सम्बन्ध है, क्योंकि चन्द्र लग्न भी है और जलीय ग्रह भी; अतः जब चन्द्र का तथा द्वितीयेश (मुख) का प्रभाव व्यवसाय-द्योतक ग्रह पर पड़ता है तो मनुष्य खाने-पीने के कार्य जैसे होटल आदि का कार्य, दूध आदि खाद्य पदार्थों की बिक्री का कार्य करता है ।
चन्द्र जब व्यवसाय से संबन्ध रखता हो और उस पर राहु का प्रभाव हो तो मनुष्य शराब बेचने का कार्य करता है, क्योंकि ‘शराब’ विषसंपृक्त जलींय पदार्थ का ही रूपान्तर मात्र है और राहु और राहु विष तथा मलिनता का द्योतक है ।
चन्द्र एक ‘स्त्री’ ग्रह है जब यह ग्रह दूसरे स्त्री-ग्रहों – शुक्र, बुध, शनि आदि को लेकर ‘व्यवसाय’ का परिचायक होता है तो मनुष्य को स्त्रियों के साथ मिलकर व्यवसाय करने का अवसर प्राप्त होता है, जैसा कि फिल्म लाइन में अभिनेता होना। राजकपूर, अशोककुमार आदि फिल्म-अभिनेताओं की कुण्डलियों में यह योग देखने को मिलता है ।
यदि स्त्री-ग्रह नीच स्थिति में हों तथा राहु आदि मलिन प्रभाव में हों तथा ‘जनता’ (चतुर्थ भाव ) से सम्बन्ध रखता हो तो व्यभिचार (Prostitution) से धन कमाता है ।
चूंकि चन्द्र रानी है अतः राज्य से भी इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है । अतः जब यह ग्रह राज्य-द्योतक सूर्य, बृहस्पति आदि ग्रहों से मिलकर व्यवसाय का द्योतक होता है तो राज्य-सम्बन्धी कार्य जैसे शासन-कार्य, राज्य-अधिकारी कार्य, राज्य कर्मचारी कार्य करवाता है ।
चन्द्रमा मन का कारक है। यदि यह ग्रह, चतुर्थ स्थान तथा चतुर्थ भाव का स्वामी, सभी शनि तथा राहु की दृष्टि आदि जनित प्रभाव में हों तो मनुष्य का मन मन्दगामी, उदासीन, विरक्त हो जाता है । जिसके फलस्वरूप वह मनुष्य कोई भी कार्य अथवा व्यवसाय नहीं करता। साधुओं-फकीरों अथवा सम्पत्ति-जीवी मनुष्यों की कुण्डली में ऐसा योग बैठता है ।
चन्द्र सुगन्धिप्रिय ग्रह है । अतः जब यह ‘शुक्र’ के साथ मिलकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक होता है तो सुगन्धित तेलों (Perfumery) तथा सेन्टों का काम व्यवसाय कराने वाला होता है। क्योंकि शुक्र भी सुगन्धि तथा भोगप्रिय ग्रह है ।
चन्द्र जब द्वितीयाधिपति होकर व्यवसाय का द्योतक होता है और बुध आदि व्यापारी ग्रहों से सम्बन्ध करता हुआ व्यवसाय को दर्शाता है तो चावल आदि जल से उत्पन्न होने वाले अथवा जल से घनिष्ठ संबन्ध रखने वाले खाद्य पदार्थों, जैसे चावल आदि, द्वारा धन कमाता है ।
चन्द्र जब किसी लग्न का स्वामी हो तथा द्वितीयाधिपति गुरु से प्रभावित होकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो तो मिष्ठान्न के काम से धन से पाता है ।
मंगल
मंगल अग्निमय है । यह ग्रह जब धन्ध का स्वयं अथवा केतु, सूर्य आदि अन्य अग्निद्योतक ग्रहों को साथ लेकर व्यवसाय का द्योतक होता है तो अग्नि-संबन्धित कार्यों द्वारा धनोपार्जन करवाता है जैसे भट्टी के काम, बिजली का काम, बिजली के सामान का काम, खाद्य सामग्री पकाने (Bakery) का काम और फैक्टरी (Factory) का काम करवाता है ।
मंगल साहस तथा हिसाप्रिय है । जान-जोखों के कार्य इसे बहुत प्रिय हैं अतः मिलिटरी अथवा रक्षा विभाग (Defence Department) से इस का घनिष्ठ सम्बन्ध है । जब यह व्यवसाय का द्योतक होता है तो मनुष्य रक्षा विभाग में आफिसर अथवा कर्मचारी अथवा उस विभाग से संबन्धित कार्य करने वाला होता है ।
मंगल भूमिपुत्र कहलाता है अर्थात् इस ग्रह का भूमि, मकान आदि से घनिष्ठ संबन्ध है । अतः जब यह चतुर्थेश होकर अथवा चतुर्थेश से मिलकर व्यवसाय का द्योतक होता है तो भूमि की आय, किराया (Rent) आदि द्वारा धन दिलाता है ।
यदि मन पर भी मंगल का अधिक प्रभाव हो जैसे लग्न में मंगल की स्थिति अथवा लग्नेश, चतुर्थेश पर मंगल की दृष्टि हो और साथ ही साथ मंगल काम-व्यवसाय का द्योतक ग्रह भी बनता हो तो मनुष्य डकैती आदि क्रूर कार्यों से धन पाता है, विशेषतया तब जब कि एकादश भाव पर भी मंगल का प्रभाव हो ।
मंगल पुरुषार्थप्रिय, क्रियाप्रिय, कर्मठ ग्रह है अतः अतः जब यह काम व्यवसाय का द्योतक होता है तो मनुष्य में प्रबन्ध की योग्यता (Executive Ability) आ जाती है और वह दूसरों से कार्य लेने में समर्थ रहता है ।
मंगल हेतुप्रिय (Logical) ग्रह है । यह मनुष्य में बुद्धि को तथा ऊहापोह शक्ति को बढ़ाता है अतः जब यह ग्रह बुद्धि-स्थान का स्वामी होकर वलवान् तथा व्यवसाय का द्योतक होता है तो मनुष्य को शासक तथा मन्त्री बना देता है । देखा गया है कि मंगल की पंचम भाव पर दृष्टि मनुष्य को तीव्र बुद्धि वाला बनाती है।
मंगल एक क्षत्रिय (Warrior) ग्रह है। सूर्य भी क्षत्रिय ग्रह है । जब सूर्य से प्रभावित मंगल ‘व्यवसाय’ का परिचायक होता है तो मनुष्य को राज्य के क्षात्र विभाग (Defence) में कार्य करवाता है विशेषतया जबकि तृतीयेश तथा द्वादशेश भी इस योग में सम्मिलित हों ।
मंगल को चोरी की भी आदत है । जब यह ग्रह ‘चोर’ स्थान का स्वामी हो, अथवा छठे से छठे अर्थात् ग्यारहवें भाव का स्वामी हो तो इस में ‘चोरी’ का भाव आ जाता है। यदि ऐसा मंगल शुभ प्रभाव से हीन होकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो तो मनुष्य चोरी आदि के व्यवसाय से धन प्राप्त करता है ।
मंगल यदि चन्द्र तथा शुक्र से प्रभावित होता हुआ तथा चतुर्थेश होता हुआ व्यवसाय का द्योतक हो तो मनुष्य घर, (लॉज – Lodge) द्वारा धन कमाता है । चन्द्र जनता है, शुक्र इकट्ठा करता है, तथा मंगल’ भूमि से तथा जायदाद से लाभ का प्रतीक है ।
बुध
बुध ‘बुद्धि’ का ग्रह है । यदि यह ग्रह द्वितीय, पंचम, नवम आदि बुद्धि-स्थानों का स्वामी होता हुआ ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो अर्थात् लग्न लग्नेश, चन्द्र-चन्द्रेश, सूर्य-सूर्यश को अधिकतम प्रभावित करता हो तो मनुष्य बुद्धिजीवी होता है । अर्थात् स्कूल मास्टर, प्रोफेसर, अध्यापक आदि होकर धनोपार्जन करता है ।
बुध ‘भाषण’ अथवा ‘वाणी’ का कारक ग्रह है; अतः यदि यह ग्रह द्वितीयेश, पंचमेश होता हुआ गुरु के साथ व्यवसाय का द्योतक हो तो मनुष्य भाषणों द्वारा धनोपार्जन करता है, जैसे कि वकील करते हैं ।

नमस्कार । मेरा नाम अजय शर्मा है। मैं इस ब्लाग का लेखक और ज्योतिष विशेषज्ञ हूँ । अगर आप अपनी जन्मपत्री मुझे दिखाना चाहते हैं या कोई परामर्श चाहते है तो मुझे मेरे मोबाईल नम्बर (+91) 7234 92 3855 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद ।
बुध व्यापार का ग्रह है। यदि यह ग्रह शनि, शुक्र आदि व्यापार-द्योतक ग्रहों को साथ लेकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक ग्रह वनता हो तो मनुष्य व्यापारी होता है। बुध के बलवान होने की दशा में वह कपड़े का व्यापार करता है, क्योकि बुध का कपड़े से घनिष्ठ सम्बन्ध है ।
बुध ‘लेखक’ है, जब वह व्यवसाय का द्योतक होता है और ‘राज्य’ द्योतक ग्रहों, सूर्य आदि से भी प्रभावित होता है तो मनुष्य राज्य के किसी विभाग में लिखने का कार्य करने वाला जैसे क्लर्क (Clerk) अथवा स्टेनो (Steno) का कार्य करता है। यदि बहुत बलवान् हो तो लेखा आफिसर (Accounts officer) बना देता है ।
यदि बुध मंगल के साथ बली हो और व्यवसाय का द्योतक हो तो हिसाब किताब (Mathematics) का व्याख्याता (Lecturer) बना देता है ।
बुध यदि तृतीयाधिपति हो और बलवान् होकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो अर्थात् लग्न लग्नेश आदि लग्नों पर अपना प्रभाव अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक डाल रहा हो तो मनुष्य अपने लेखों द्वारा आजीविका का उपार्जन करता है, क्योंकि बुध लेखक है और तृतीय स्थान भी हाथ से लिखने ही को दर्शाता है ।
बुध फलित ज्योतिष का भी कारक है जब इस का सम्बन्ध जनता से अर्थात् चतुर्थ भाव से तथा नवम भाव एवं द्वादश भाव से होता है और द्वितीयाधिपति को साथ लेकर यह व्यवसाय का द्योतक होता है तो ज्योतिष द्वारा धनोपार्जन करता है ।
बुध विनोदप्रिय है अतः जब यह ग्रह अन्य विनोदप्रिय ग्रहों तथा अंगों, जैसे चतुर्थेश, पञ्चेश तथा शुक्र से सम्बन्ध करता हुआ व्यवसाय का द्योतक होता है तो विनोद द्वारा अर्थात् सिनेमा, मोदसभा (Amusement Park) आदि आमोद-प्रमोद के स्थानों से आजीविका को प्राप्त करता है ।
बुध गुमाश्ता (Agent) है । यदि यह चतुर्थेश से सम्बन्ध रखता हो और मंगल से भी प्रभावित हो तो जायदाद (Property) का एजेन्ट (Agent) होता है ।
बृहस्पति
यह ग्रह कानून (Law) से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है । अतः यदि यह अष्टमेश, एकादशेश तथा बलवान होकर बुध को साथ लेकर अथवा शुक्र को साथ लेकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो अर्थात् लग्न लग्नेश आदि लग्नों पर अपना प्रभाव डालता हो तो मनुष्य को वकील (Vakil), एडवोकेट (Advocate) इनकमटैक्स का वकील (Income Tax Practitioner) बनाता है । उपरोक्त गुरु पर यदि मंगल का प्रभाव हो तो फौजदारी का वकील (Criminal Lawyer) होता है। अधिक बलवान् होने पर यही बृहस्पति व्यक्ति को न्यायाधीश (Judge) भी बना देता है । अष्टम तथा एकादश स्थान राज्य की आय (Revenues) हैं।
बुध की भाँति वृहस्पति भी भाषण से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है। अतः जब वाणि-द्योतक घरों-द्वितीय तथा पञ्चम का स्वामी होता हुआ बुध को साथ लेकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक होता है तो मनुष्य भाषण द्वारा आजीविका प्राप्त करता है जैसे कि वकील तथा अध्यापक लोग करते हैं ।
बृहस्पति का जब नवमेश, द्वादशेश व पञ्चमेश से सम्बन्ध होता है और पुनः वह बृहस्पति व्यवसाय का परिचायक हो तो मनुष्य धर्मशाला, मन्दिर देवस्थान आदि द्वारा पुरोहित-पुजारी आदि के रूप से धन प्राप्त करता है । ऐसे योग में लग्न, लग्नेश आदि पर बृहस्पति तथा शुक्र, का प्रभाव होने से मनुष्य का जन्म भी ब्राह्मण कुल में होता है (बृहस्पति तथा शुक्र ब्राह्मण ग्रह हैं) ।
वृहस्पति ‘धन’ का कारक ग्रह है । जब यह ग्रह द्वितीय तथा एकादश भावों का स्वामी हो और लग्न लग्नेश आदि लग्नों पर अधिकतम प्रभाव डालने के कारण व्यवसाय का द्योतक ग्रह भी हो तो यह ‘गतिशील’ धन (Liquid Assets) से, सूद ब्याज से, कैश सर्टिफिकेट्स (Cash Certificates ), किराया (Rent) आदि से या बैंक की नौकरी से धनोपार्जन कराता है ।
बृहस्पति बलवान् हो और एकादशाधिपति हो तो बड़े भाई का पक्का प्रतिनिधि होता है । ऐसा बृहस्पति यदि लग्न, लग्नेश आदि पर अधिकतम प्रभाव डालने के कारण व्यवसाय का द्योतक हो तो ऐसा व्यक्ति बड़े भाई द्वारा अथवा उससे मिलकर धनोपार्जन करता है और उसे बड़े भाई से बहुत सहायता मिलती है ।
वृहस्पति को ‘राज्यकृपा कारक’ माना गया है और नवम स्थान राज्यकृपा का है। यदि बृहस्पति नवमेश होकर बलवान हो और लग्न, लग्नेश आदि पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव डालने के कारण ‘व्यवसाय’ का द्योतक भी हो तो मनुष्य को दैवयोग से राज्य की प्राप्ति होती है और उससे धन मिलता है अथवा किसी महान् राज्याधिकार द्वारा आजीविका प्राप्त होती है।
शुक्र
गुरु की भाँति शुक्र भी कानून (Law) से सम्बन्ध रखता है क्योंकि यह भी दैत्याचार्य है । जब गुरु के साथ मिलकर यह ग्रह लग्न, लग्नेश आदि लग्नों पर अपेक्षाकृत अधिकतम प्रभाव डालता है तो व्यक्ति को कानून से संबन्धित काम-धन्धों में लगाता है; जैसे वकालत, सेल्स टैक्स इन्स्पेक्टर (Sales Tax Inspector), इन्कम टैक्स प्रेक्टीशनर आदि ।
शुक्र स्त्री ग्रह है । जब यह ग्रह चन्द्र-बुध-शनि आदि स्त्री-ग्रहों को साथ लेकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक उपरोक्त रीति से होता है तो स्त्रियों के सम्पर्क से अथवा उनके द्वारा धनोपार्जन कराता है जैसा कि फिल्म- लाइन के अभिनेता, डाइरेक्टर आदि करते हैं ।
शुक्र जलीय ग्रह है । चन्द्र के साथ अथवा जलीय भाव के स्वामियों के साथ मिलकर जब यह ग्रह उपरोक्त रीति से ‘व्यवसाय’ का द्योतक होता है तो मनुष्य जलीय कार्यों से धनोपार्जन करता है जैसे, जल-सेना (Navy) में भरती होकर, सोडावाटर फैक्टरी (Soda Water Factory ) चला कर, तेल अथवा शरबत आदि तरल पदार्थ बेचकर, रंग बेच कर, पानी सप्लाई (Water Supply) के विभाग में नौकरी द्वारा तथा अन्य जलीय कार्यों द्वारा धनोपार्जन करता
शुक्र एक सौन्दर्यप्रिय ग्रह है । सुन्दरता तथा भोगविलास से सम्बन्ध रखने वाले जितने व्यवसाय हैं सब का सम्बन्ध शुक्र से है जैसे, मुख तथा शरीर के सौन्दर्य का वर्धन करने वाले पदार्थ (Cosmetics), बढ़िया तेल, इतर-सुगन्धित वस्तुएँ आदि ।
अतः जब शुक्र बुध आदि ‘व्यापारी’ ग्रहों को साथ लेकर ‘व्यवसाय’ का परिचायक होता है तो व्यक्ति को फैंसी गुड्स (Fancy Goods) का विक्रेता आदि बना देता है ।
शुक्र गाना-बजाना बहुत चाहता है । जब भाषण भावों (द्वितीय तथा पञ्चम) तथा वाद्यकारक बुध से संबन्ध करता हुआ शुक्र ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो तो व्यक्ति गाने-बजाने (Music & Musical Instruments ) द्वारा आजीविका का उपार्जन करने वाला होता है ।
शुक्र ‘वाहन’ का भी कारक है । यदि वाहन स्थान से सम्बन्ध रखता हुआ अथवा वाहनेश (चतुर्थेश) से संबन्ध रखता हुआ शुक्र ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो तो मनुष्य को वाहन द्वारा आजीविका मिलती है अर्थात् वह गाड़ीवान (Driver), पाइलट (Pilot) आदि होता है । यदि वायुस्थानीय ग्रहों का प्रभाव सम्मिलित हो तो वायुयान का चालक होता है अन्यथा, दूसरे मोटर आदि यान का चालक होकर आजीविका का उपार्जन करता है ।
शुक्र जब चतुर्थ भाव अथवा चतुर्थेश अथवा चन्द्र पर प्रभाव डालता है और चन्द्र पर शनि का प्रभाव भी होता है तो मनुष्य में कविता करने की शक्ति उत्पन्न होती है । ऐसा शुक्र यदि ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो तो मनुष्य को कविताओं आदि से धन की प्राप्ति होती है।
शुक्र जब सप्तमाधिपति हो तो ‘रत्न’ प्राप्त होता है, यदि ऐसा शुक्र शुभ, लग्नाधिपति धनाधिपति, अथवा गुरु से प्रभावित होता हुआ व्यवसाय का द्योतक हो तो मनुष्य सर्राफ होता है । और रत्नों का व्यापार करता है।
तृतीयाधिपति शुक्र चन्द्र से प्रभावित होता हुआ यदि ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो तो ‘फल’ का व्यापार करने वाला होता है। शुक्र फल है । चन्द्र खाद्य पदार्थ है, दोनों रसमय हैं।
शनि
शनि पत्थर माना गया है। यदि इस ग्रह का सप्तम भाव से घनिष्ठ सम्बन्ध हो तो यह ग्रह ‘पत्थर’ का प्रतिनिधि हो जाता है। यदि ऐसे शनि का प्रभाव लग्न, लग्नेश आदि लग्नों पर हो तो मनुष्य सड़क आदि बनवाने तथा पत्थर सप्लाई करने आदि पत्थर के कामों द्वारा जीवन-यापन करता है । अथवा पी. डब्ल्यू. डी. (P. W. D) में कार्य करता है।
दशमेश शनि भी पत्थर का द्योतक है, क्योंकि दशम उच्च स्थान (पहाड़) है। यदि दशमेश शनि व्यवसाय का द्योतक हो तो भी पत्थर का काम सीमेन्ट (Cement) आदि का काम करने वाला होता है ।
शनि का भूमि क्षेत्र (Lands) से विशेष सम्बन्ध है, बल्कि इस का शनि कारक है अतः जब शनि चतुर्थेश अथवा योगकारक होता हुआ बलवान हो और ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो तो मनुष्य को बहुत भूमि की प्राप्ति होती है।
शनि अधोमुखी ग्रह है अतः पृथ्वी के भीतर रहने वाले पदार्थों लोहा, कोयला, पेट्रोल, भूमि, तेल का कारक है । जब शनि चतुर्थेश होकर व्यवसाय का परिचायक होता है तो इन पदार्थों से धन का लाभ देता है ।
शनि मृत्यु से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है, अतः मृत शरीरों से प्राप्त होने वाला चमड़ा शनि द्वारा प्रदिष्ट होता है । जब शनि अष्टमाधिपति अथवा तृतीयाधिपति होता हुआ ‘व्यवसाय’ का द्योतक होता है तो चमड़ा, जूते आदि द्वारा आजीविका देता है ।
शनि भूमि-क्षेत्र का कारक है अतः जब चतुर्थेश होकर व्यवसाय का द्योतक होता है तो मनुष्य को कृषि (Agriculture) द्वारा धन देता है ।
शनि रोग से सम्बन्धित है अतः डाक्टर अथवा वैद्य भी है। अतः जब यह ग्रह सूर्य, राहु आदि अन्य ‘वैद्य’ ग्रहों के प्रभाव को लेकर ‘व्यवसाय’ का द्योतक होता है ता मनुष्य चिकित्सक (Doctor) होता है यदि विद्या का पर्याप्त योग हो तो । शनि यदि बलवान न हो तो निम्न प्रकार के नौकरी आदि परतन्त्रता के कार्य देता है ।
शनि बलवान् हो और विद्या पर्याप्त हो, तथा शनि मंगल से प्रभावित हो और ऐसा शनि यदि व्यवसाय का द्योतक हो तो यन्त्र (Machinery) आदि का कार्य करने वाला इन्जीनियर (Engineer) होता है जिसका बिजली (Electricity) से सम्बन्ध होता है । यदि शनि का मंगल से सम्बन्ध न हो बुध से हो तो मैकेनिकल इंजीनियर (Mechanical Engineer) होता है ।
शनि लोहा है जब यह तृतीयेश चतुर्थेश हो तो वाहन की लोह पटड़ी होता है अतः रेलवे (Railway) का प्रतिनिधि होता है, यदि ऐसा शनि व्यवसाय’ का द्योतक हो तो रेल विभाग में कार्य करने वाला अथवा इंजिन ड्राइवर (Engione Driver) होता है ।
शनि पत्थर है । यदि सप्तमेश होता हुआ तथा शुक्र से बहुत प्रभावित होता हुआ ‘व्यवसाय’ का द्योतक हो तो मनुष्य को पत्थर की मूर्तियों के काम (Sculpture) से धनोपार्जन करवाता है ।
व्यवसाय का चुनाव और आर्थिक स्थिति
- कुण्डली की वैज्ञानिक व्याख्या
- ग्रहों का व्यवसाय पर प्रभाव
- पाराशरीय धनदायक योग
- लग्नो के विशेष धनादायक ग्रह
- धन प्राप्ति में लग्न का महत्त्व
- विपरीत राजयोग से असाधारण धन
- नीचता भंग राजयोग
- अधियोग से धनप्रप्ति
- स्वामिदृष्ट भाव से धनप्रप्ति
- कारकाख्ययोग से धनप्रप्ति
- सुदर्शन तथा धनबाहुल्य
- शुक्र और धन
- जातक का व्यवसाय
- मित्र, भाई यॉ सम्बंधी – किससे धन लाभ होगा ?
- धन कब मिलेगा ?
- व्यव्साय चुनने की पध्दति
- धन हानि योग
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